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क्यों पड़ी भाजपा व जननायक जनता पार्टी के गठबंधन में दरारें , कौन रहेगा फायदे में

 

अशोक भाटिया

हरियाणा के लिए मंगलवार का दिन बदलाव की बड़ी बयार लेकर आया। सूबे में सरकार की तस्वीर बदल गई है तो साथ ही बदला है गठबंधनों का गणित भी। मनोहर लाल खट्टर की जगह सरकार की कमान अब नायब सिंह सैनी के हाथों में है। भारतीय जनता पार्टी और दुष्यंत चौटाला के नेतृत्व वाली जननायक जनता पार्टी का चार साल पुराना गठबंधन चुनावी साल में आकर टूट गया है। भाजपा -जजपा गठबंधन टूटने की खबर ऐसे समय में आई है जब पिछले कुछ दिनों से एक के बाद साथ छोड़कर जा चुके पुराने और नए सहयोगियों की एनडीए में एंट्री की खबरें आ रही थीं।

बताया जाता है कि जननायक जनता पार्टी के साथ उसके गठबंधन में दरारें पिछले साल 10 लोकसभा सीटों के लिए संघर्ष के बीच दिखाई देने लगी थीं, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की थी कि भाजपा उन सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। हरियाणा के पूर्व उपमुख्यमंत्री दुष्यन्त चौटाला के नेतृत्व वाली जजपा भी इसी तरह का दावा कर रही थी। यह किसी से छिपा नहीं था कि यह आपसी सुविधा का गठबंधन था, साझा विचारधारा का नहीं। जजपा का जन्म 2019 के विधानसभा चुनावों से पहले इंडियन नेशनल लोक दल में ऊर्ध्वाधर विभाजन के परिणामस्वरूप हुआ था। उसने 10 विधानसभा सीटें जीतकर खुद को किंगमेकर की भूमिका में पाया। जिस सदन में भाजपा के पास 40 सीटें थीं, उसकी कट्टर प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के पास 31, निर्दलीय सात, और इनेलो और हरियाणा लोकहित पार्टी के पास एक-एक सीट थी, वहां जजपा की स्थिति निर्णायक थी।

इस कवायद में सबसे ज्यादा नुकसान जजपा को हुआ है। नई नवेली पार्टी ने खुद को इनेलो के असली उत्तराधिकारी के रूप में पेश किया था और 10 सीटों के साथ भरपूर लाभ उठाया था। लेकिन अब खुद को सत्ता और निर्वाचन क्षेत्र दोनों के बिना महसूस कर रही है। गठबंधन का खत्म होना इनेलो के लिए भी अच्छा संकेत नहीं है, जो कभी हरियाणा में शासन करने वाली एक मजबूत क्षेत्रीय पार्टी थी। विडंबना यह है कि 2000 के विधानसभा चुनावों में 47 सीटों के साथ जीत हासिल करने के बाद इनेलो ने 1999 में भाजपा के साथ गठबंधन किया था। भाजपा का संदेश स्पष्ट और स्पष्ट है: कोई भी मुख्यमंत्री हो सकता है, जीतने की क्षमता ही मायने रखती है।

भाजपा की तरफ से यह बदलाव सिर्फ दिखावटी नहीं है। 55 वर्षीय कुरूक्षेत्र के सांसद नायब सैनी के रूप में हरियाणा को ओबीसी समुदाय से मुख्यमंत्री मिलता है। 2011 की जनगणना के अनुसार अन्य पिछड़ा वर्ग राज्य की आबादी का 40 प्रतिशत से अधिक है। जाट केवल 20-25 प्रतिशत हैं। भाजपा ने 2014 के चुनावों के दौरान भी इस गणित को ध्यान में रखा था, जब अतीत से हटकर, उसने करनाल से पहली बार विधायक और पंजाबी खत्री, खट्टर को उस राज्य में स्थापित किया, जिसे लोकप्रिय रूप से जाटलैंड कहा जाता था। कांग्रेस भी ओबीसी के प्रतिनिधित्व की कमी पर प्रकाश डाल रही है, जिसकी अगुवाई पार्टी के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी कर रहे हैं। पिछले साल अप्रैल में कांग्रेस द्वारा ओबीसी उदय भान को राज्य पार्टी प्रमुख के रूप में नियुक्त करने के बाद, भाजपा ने भी नायब सैनी का अनुसरण किया। अब उन्हें शीर्ष पद पर पदोन्नत कर दिया गया। यह बड़ा विभाजन हिसार से भाजपा सांसद और राज्य के प्रसिद्ध किसान नेता सर छोटू राम के परपोते बृजेंद्र सिंह के जजपा पर मतभेदों के बाद कांग्रेस में शामिल होने के लिए पार्टी छोड़ने के कुछ दिनों बाद हुआ है। गुटबाजी से घिरी कांग्रेस को अब और मेहनत करनी होगी क्योंकि भाजपा उसके नए रूप का फायदा उठा रही है।

सत्ताधारी गठबंधन में टूट विपक्ष के लिए झटका कैसे है? इसे समझने के लिए हरियाणा के सामाजिक समीकरणों के साथ ही सियासी मिजाज की भी चर्चा करनी होगी। हरियाणा में करीब 25 फीसदी जाट आबादी है। हरियाणा की सत्ता के शीर्ष पर लंबे समय तक जाट चेहरे काबिज रहे हैं। चौटाला परिवार की इंडियन नेशनल लोक दल हो या भूपेंद्र सिंह हुड्डा के सहारे कांग्रेस पार्टी, दोनों ही दलों की राजनीति का आधार जाट ही रहे हैं।

भाजपा ने 2014 के चुनाव में जीत के बाद जब गैर जाट मनोहर लाल खट्टर को सरकार की कमान सौंपी, तब इसे लेकर भी खूब हो-हल्ला भी हुआ। 2019 के चुनाव में भाजपा बहुमत के आंकड़े से छह सीट पीछे रह गई तो इसके पीछे भी गैर जाट सीएम और जाट आरक्षण को लेकर जाट वोटर्स की नाराजगी एक वजह बताई गई। 2024 के चुनाव से पहले भी जाट नाराज बताए जा रहे हैं। किसान आंदोलन के समय पंजाब के बाद हरियाणा दूसरा सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा था। किसान कुछ दिन पहले भी एमएसपी से संबंधित कानून की मांग को लेकर सड़क पर उतर आए थे। कांग्रेस को माहौल अपने मुफीद लग रहा था लेकिन अब तस्वीर बदल गई है।

भाजपा ने दुष्यंत चौटाला की पार्टी से गठबंधन तोड़ कर यह संदेश दे दिया है कि वह हरियाणा में गैर जाट राजनीति की उसी लाइन पर आगे बढ़ेगी जो उसने 2014 में खींची थी। पिछले कुछ समय से हरियाणा कांग्रेस जाट पॉलिटिक्स की पिच पर खुद को मजबूत करने में जुटी थी। चौधरी बीरेंद्र सिंह के बेटे और हिसार से भाजपा सांसद बृजेंद्र चौधरी के कांग्रेस में जाने को भी इन सबसे जोड़कर ही देखा जा रहा था। आईएनएलडी की जाट वोट बैंक पर पकड़ भी दुष्यंत के अलग पार्टी बना लेने के बाद कमजोर पड़ी है।

भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए जजपा को कहीं ना कहीं यह डर भी सता रहा था कि जाट वोट उससे छिटक न जाए। जजपा के नेता दुष्यंत के सामने भी यह चिंता जता रहे थे कि भाजपा के साथ होने से पार्टी को जाट समाज की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है। चर्चा तो यह भी है कि गठबंधन तोड़ना कहीं दोनों दलों की सोची-समझी रणनीति तो नहीं? हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप डबास इस तरह के कयासों को खारिज करते हुए कहते हैं कि अगर ऐसा होता तो जजपा में टूट की नौबत नहीं आती। भाजपा , जजपा के कई विधायकों के संपर्क में होने का दावा कर रही है। दुष्यंत ने दिल्ली में विधायक दल की बैठक बुलाई थी और जजपा के कई विधायक चंडीगढ़ में थे।

आईएनएलडी की पकड़ कमजोर होने, जजपा के भाजपा के साथ होने से कांग्रेस को जाट समाज से एकमुश्त समर्थन की उम्मीद थी। अब गठबंधन टूटने के बाद जजपा की रणनीति भी जाट वोटर्स के सामने खुद को एक विकल्प के रूप में पेश करने की होगी। जजपा अगर अपनी रणनीति में सफल रहती है और जाट वोट बैंक में सेंध लगा पाती है तो जाहिर है नुकसान कांग्रेस को को ही होगा। एंटी वोट बंटने का सीधा लाभ सत्ताधारी भाजपा को मिल सकता है।

गौरतलब है कि दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने सीटें आपस में बांट लीं लेकिन पंजाब में दोनों अलग अलग लड़ रहे हैं। क्योंकि नहीं चाहते कि किसी तीसरे को एंट्री पंजाब की सियासत में मिले। क्या कुछ ऐसा ही फॉर्मूला हरियाणा का बना है ? जहां कहा जा रहा है कि दुष्यंत चौटाला की पार्टी से दूरी बनाना और अपनी ही पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री को बदलना। इसमें एक तीर से दो निशाने साधे गए हैं। एक निशाना सत्ता विरोधी हवा को कंट्रोल करना और दूसरा निशाना दुष्यंत चौटाला को अकेले मैदान में छोड़कर कांग्रेस के जाट वोट का हिस्सा अकेले पाने से रोकना।

2019 के लोकसभा चुनाव में एससी वोट का 58 फीसदी हिस्सा भाजपा के खाते में गया था जबकि कांग्रेस 25 फीसदी वोट हासिल कर सकी थी। वहीं मुस्लिम वोट का भाजपा 15 को प्रतिशत हिस्सा मिला जबकि कांग्रेस 76 फीसदी वोट मिले। वहीं जाट वोट का 39 फीसदी हिस्सा भाजपा के हिस्से में आया जबकि कांग्रेस 40 फीसदी वोट हासिल कर सकी थी। वहीं भाजपा के खाते में ओबीसी का 70 फीसदी वोट आया था जबकि कांग्रेस केवल 18 प्रतिशत ही हासिल कर सकी थी। वहीं सामान्य वर्ग से भाजपा को 69 फीसदी मिले थे जबकि और कांग्रेस 21 फीसदी वोट ही हासिल कर सकी।यानी मुस्लिम छोड़ इकलौता जाट वोट ही हरियाणा का ऐसा है, जिसमें भाजपा चालीस फीसदी से नीचे का हिस्सा पाती है। तो क्या इसी से जुड़ी कोई रणनीति अपनी ही गठबंधन सरकार को हिला डुलाकर, सीएम बदल कर भाजपा ने बनाया है ?

कहने को कहा तो ये जाता है कि दुष्यंत चौटाला दो से तीन सीट लोकसभा की मांग रहे थे। भाजपा ने नहीं दिया। खुद उन्हें सरकार से हटा सकते नहीं थे। लिहाजा पूरी कैबिनेट ने जाकर इस्तीफा दे दिया और सरकार बदल गई। लेकिन इसमें खेल है। खेल है जाट वोट का। हरियाणा में 25 फीसदी जाट वोट है जो भाजपा और दुष्यंत चौटाला के एक साथ लड़ने पर कांग्रेस के पास ज्यादा जाता। लेकिन अब दुष्यंत चौटाला भी अलग से मैदान में होंगे तो जाट वोट के लिए जजपा , इंडियन नेशनल लोकदल और कांग्रेस के बीच बंटवारा होगा। जानकार कहते हैं फायदे की यही राजनीतिक रणनीति भाजपा ने अपनाई है।

भाजपा ने हरियाणा में ओबीसी वर्ग से आने वाले नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री बनाकर एक और पिछड़े वर्ग के नेताओं को मुख्यमंत्री लिस्ट में शामिल कर दिया है। देश के चुनाव में जब कांग्रेस जाति गणना की मांग के साथ पिछड़ों को आरक्षण देने का वादा करती है। तब भाजपा जरूर इस बात को याद कराएगी कि कांग्रेस ने देश में कितने ओबीसी मुख्यमंत्री बनाए और भाजपा ने कितने ?

आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं होते। कई बार वे कहानी भी कहते हैं। भारत जैसे सामाजिक विविधता वाले देश में चुनावी आंकड़ों से राजनीति विज्ञान के कई नई क्षेत्र खुलते हैं। निशांत रंजन द्वारा आजादी के बाद के मुख्यमंत्रियों की सामाजिक पृष्ठभूमि के संबंध में जुटाए गए आंकड़ों से पता चलता है कि भाजपा ने अब तक जितने मुख्यमंत्री बनाए हैं, उनमें से 30.9 फीसदी ओबीसी हैं। जबकि कांग्रेस द्वारा बनाए गए मुख्यमंत्रियों में सिर्फ 17.3 फीसदी ओबीसी हैं। अन्य दलों के लिए ये आंकड़ा 28 फीसदी है।

 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जननायक जनता पार्टी के कम से कम पांच विधायक पार्टी छोड़ने के मूड में हैं। दुष्यंत ने नई आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर नई दिल्‍ली में पार्टी की बैठक बुलाई है। जननायक जनता पार्टी के सभी 10 विधायकों और सीनियर नेताओं को इसमें शामिल होना था। भादरा से विधायक नैना चौटाला, उकलाना से विधायक अनूप धानक, नरवाना से विधायक रामनिवास और शाहबाद से विधायक रामकरण ही मंगलवार को दिल्ली पहुंचे हैं। बाकी पांच विधायकों का अता-पता नहीं। हरियाणा में इसी साल के अंत तक विधानसभा चुनाव भी होने हैं। ऐसे में दुष्यंत के लिए आगे की डगर कठिन हो चली है।बताया तो यह भी जाता है कि हरियाणा के नारनौंद से विधायक राम कुमार गौतम, बरवाला विधायक जोगीराम सिहाग, गुहला विधायक ईश्वर सिंह और जुलाना विधायक अमरजीत ढांडा के जजपा छोड़ने की चर्चा है। द इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि दुष्यंत के करीबियों में शुमार रहे देवेंद्र सिंह बबली भी पाला बदली सकते हैं। बबली पिछले कुछ दिनों से दुष्यंत के खिलाफ बयान दे रहे थे। पिछले साल बबली को हरियाणा कैबिनेट में जगह मिली थी।

अशोक भाटिया,

वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार ,लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

लेखक 5 दशक से लेखन कार्य से जुड़े हुए हैं

पत्रकारिता में वसई गौरव अवार्ड से सम्मानित,

वसई पूर्व – 401208 ( मुंबई )

फोन/ wats app 9221232130 E mail – vasairoad . yatrisangh@gmail.com

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